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दृष्टिकोण की विकृतियाँ हमें अकारण उलझनों में उलझाती हैं और खिन्न रहने के लिए विवश करती हैं। हम गरीब हैं या अमीर, […]
१० नवंबर २०२४ रविवार- ‼️
-कार्तिक शुक्लपक्ष नवमी २०८१
वृक्ष ही जीवन है अब यह सत्य बात लोगों के लिए मात्र निज स्वार्थ सिद्धि के लिए प्रयोग में लाई जा रही है। वृक्षों की व्यथा कौन सुने सब आडम्बर की अटारी पर चढ़ कर बैठे हुए हैं। विकास तो सबको सूझ रहा है परंतु आंतरिक दुःख से हर कोई अनभिज्ञ है ।
विलुप्ति का समा बांधे ये मेरा मन है क्यूं भाजे मेरे मन की मेरे तन की मचलती आस तुम ही हो,,, मैं […]

