श्रद्धा से भक्ति, विश्वास से संकल्प—अंतःकरण की शक्ति का आध्यात्मिक स्वरूप।
अंतःकरण की शक्ति का आध्यात्मिक विज्ञान
धर्म–संस्कृति डेस्क मानव जीवन की आंतरिक उत्कृष्टता को जिस भाव से पहचाना जाता है, वही श्रद्धा है। श्रद्धा अंतःकरण की वह सूक्ष्म अवस्था है, जहाँ आत्मा श्रेष्ठता के प्रति असीम प्रेम और आस्था से भर जाती है। इसका व्यावहारिक और सक्रिय स्वरूप भक्ति कहलाता है। यद्यपि सामान्य बोलचाल में श्रद्धा और भक्ति को एक-दूसरे का पर्याय मान लिया जाता है, फिर भी दोनों के बीच एक सूक्ष्म किंतु महत्वपूर्ण अंतर विद्यमान है।
श्रद्धा अंतरात्मा की वह गहरी अनुभूति है, जो श्रेष्ठ मूल्यों, आदर्शों और दिव्यता के प्रति सहज आकर्षण उत्पन्न करती है। इसे उत्कृष्टता के प्रति निःसीम प्रेम के रूप में समझा जा सकता है। श्रद्धा ही वह आधार है, जिस पर व्यक्ति का संपूर्ण आध्यात्मिक और नैतिक व्यक्तित्व निर्मित होता है।
भक्ति, श्रद्धा की अभिव्यक्ति है। करुणा, उदारता, सेवा, त्याग और आत्मीयता के भाव से प्रेरित होकर किए गए कर्म भक्ति के अंतर्गत आते हैं। देश-भक्ति, ईश्वर-भक्ति, आदर्श-भक्ति जैसे भावों से उत्पन्न त्याग, बलिदान और तप-साधना के असंख्य उदाहरण मानव इतिहास में मिलते हैं। ये सभी भक्ति भावना की ही प्रेरक शक्ति हैं।
जब आस्थाएँ और आकांक्षाएँ परिपक्व होकर लक्ष्य की ओर दृढ़ निश्चय के साथ अग्रसर होती हैं, तब वे संकल्प का रूप धारण कर लेती हैं। संकल्प की शक्ति सर्वविदित है। इतिहास साक्षी है कि संकल्पवान व्यक्तियों ने सामान्य साधनों और सीमित अवसरों में भी असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं।
संकल्प की प्रखरता मस्तिष्क और शरीर—दोनों को वांछित दिशा में प्रवाहित कर देती है। असंख्य बाधाओं से टकराते हुए भी यह शक्ति व्यक्ति को उस लक्ष्य तक पहुँचा देती है, जिसे आरंभ में असंभव माना जाता था। पुरुषार्थियों की यशगाथाएँ वस्तुतः संकल्प शक्ति के चमत्कार की ही कहानी हैं।
संकल्प के प्रकट होने से पूर्व वह मनःक्षेत्र में विश्वास के रूप में अपनी जड़ें जमाता है। विश्वास ही वह बीज है, जो विकसित होकर संकल्प रूपी वृक्ष बनता है। इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि संकल्प, विश्वास की सक्रिय प्रतिक्रिया है।
इसी कारण अंतःकरण की उच्चस्तरीय आस्थाओं को श्रद्धा–विश्वास का स्वरूप दिया गया है। जब ये श्रेष्ठ स्तर पर होते हैं, तो शिव–पार्वती के युग्म की भाँति सृजन और कल्याण का प्रतीक बनते हैं। किंतु जब यही आस्थाएँ निकृष्ट स्तर पर गिर जाती हैं, तो वे आसुरी और क्रूर कर्मों में परिणत होती दिखाई देती हैं—जैसा कि दानवों और शैतानों के रूपकात्मक वर्णनों में मिलता है।
श्रद्धा, भक्ति, विश्वास और संकल्प—ये चारों मिलकर मानव जीवन की आंतरिक शक्ति संरचना का निर्माण करते हैं। इनका सही दिशा में विकास व्यक्ति को आत्मोन्नति, समाज-कल्याण और आध्यात्मिक उत्कर्ष की ओर ले जाता है।