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सद्गुण बढ़ाने और सुसंस्कृत जीवन अपनाने पर आधारित प्रेरणात्मक संदेश—चरित्र निर्माण और आत्मविकास का प्रतीक चित्र।

सद्गुण बढ़ाएं, सुसंस्कृत बनें” — चरित्र निर्माण ही मानव जीवन की सर्वोच्च साधना

नई दिल्ली। मानव जीवन में पूजा-पाठ और बाहरी साधनाओं से अधिक महत्त्व सद्गुणों की कमाई को दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जिस व्यक्ति के भीतर जितने अधिक सद्गुण होते हैं, वह उतना ही जीवन का सच्चा धनवान माना जाता है। धन से भौतिक वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं, किंतु सद्गुणों की पूँजी से व्यक्ति हर दिशा में प्रगति और आत्मोत्थान का मार्ग पा लेता है।

आध्यात्मिक चिंतकों के अनुसार, सद्गुणों के भंडार से व्यक्ति का आत्मबल और आत्मविश्वास मजबूत होता है, जो उसे निरंतर सकारात्मक राह दिखाते हैं। मधुर स्वभाव और श्रेष्ठ आचरण वाला व्यक्ति जहाँ भी जाता है, अपनी विनम्रता और गुणों से सभी को प्रभावित करता है और सहज ही लोगों का स्नेह, विश्वास और सहयोग प्राप्त कर लेता है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि सफल व्यक्तियों की वास्तविक पूँजी उनके सद्गुण ही होते हैं। सद्गुणों के कारण ही पराये अपने बन जाते हैं और विरोधी भी समय आने पर सहयोगी बन सकते हैं। इसलिए जीवन के मूल स्तंभ के रूप में सद्गुणों का विकास सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।

सद्गुण बढ़ाने का मार्ग

विशेषज्ञों का मानना है कि सद्गुणों को विकसित करने का सबसे सरल उपाय है—

  • उसी प्रकार का पढ़ना, सुनना और सोचना, जो सत्प्रवृत्तियों को मजबूत करे।
  • अपने भीतर मौजूद अच्छाइयों को पहचानना और उन्हें सींचते हुए निरंतर बढ़ाना।
  • जैसे किसान घास-फूस के बीच उगे अच्छे पौधे को सुरक्षा देकर उसे बड़ा वृक्ष बनाता है, वैसे ही हमें अपने सद्गुणों को संभालना चाहिए।

सद्गुणों से बनता उज्ज्वल भविष्य

भले ही किसी व्यक्ति के भीतर इस समय सद्गुण कम हों, लेकिन यदि वे मौजूद हैं और उन्हें बढ़ाने की सच्ची इच्छा है, तो भविष्य उज्ज्वल बनना निश्चित है। चिंतकों के अनुसार, संसार में कोई भी उपलब्धि ऐसी नहीं जो प्रबल इच्छा और पुरुषार्थ के बिना पाई जा सके।

सद्गुणों की संपत्ति ही मानव जीवन की सबसे बड़ी विभूति है। कठिनाई केवल उन लोगों को होती है जो इस दिशा में ध्यान नहीं देते। जो व्यक्ति श्रेष्ठता को समझते हैं और उसे प्राप्त करने का संकल्प लेते हैं, वे अवश्य अपने लक्ष्य तक पहुँचते हैं और श्रेष्ठ जीवन जीने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं।