रामायण का वह रहस्य जब लक्ष्मण की तपस्या और त्याग से संभव हुआ मेघनाद का वध।
अगस्त्य मुनि ने श्रीराम को सुनाई अद्भुत कथा
अयोध्या | धर्म–संस्कृति डेस्क – ज्ञान की बात ”
हनुमानजी की रामभक्ति की गाथा विश्वभर में प्रसिद्ध है, लेकिन श्रीरामकथा लक्ष्मण के त्याग और तपस्या के बिना अधूरी मानी जाती है। लंका विजय के उपरांत जब महर्षि अगस्त्य अयोध्या पधारे, तो युद्ध प्रसंग के दौरान एक ऐसी रहस्यमयी कथा सामने आई, जिसने स्वयं भगवान श्रीराम को भी आश्चर्य में डाल दिया।
भगवान श्रीराम ने अगस्त्य मुनि को बताया कि किस प्रकार उन्होंने रावण और कुंभकर्ण जैसे प्रचंड योद्धाओं का वध किया, वहीं लक्ष्मण ने इंद्रजीत (मेघनाद) और अतिकाय जैसे महाबली असुरों को पराजित किया।
इस पर अगस्त्य मुनि ने कहा—
“प्रभु! रावण और कुंभकर्ण महान वीर थे, किंतु सबसे पराक्रमी योद्धा मेघनाद था। उसने अंतरिक्ष में देवेंद्र से युद्ध कर उन्हें बंदी बना लिया था। बाद में ब्रह्मा के वरदान से ही इंद्र मुक्त हो सके। ऐसे अद्वितीय योद्धा का वध केवल लक्ष्मण ही कर सकते थे।”
अगस्त्य मुनि ने बताया कि मेघनाद को यह वरदान प्राप्त था कि उसका वध वही कर सकेगा—
यह सुनकर श्रीराम चकित रह गए। उन्होंने कहा कि वनवास काल में लक्ष्मण नियमित रूप से फल-फूल लाते थे, सीता पास ही रहती थीं और वर्षों तक बिना सोए रहना असंभव प्रतीत होता है।
अगस्त्य मुनि के सुझाव पर लक्ष्मण को बुलाया गया। श्रीराम ने आदेश दिया कि वे सत्य-सत्य उत्तर दें। तब लक्ष्मण ने जो बताया, वह त्याग और तपस्या की अनुपम मिसाल बन गया।
लक्ष्मण ने कहा कि उन्होंने कभी माता सीता के चरणों से ऊपर दृष्टि ही नहीं उठाई। ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव द्वारा दिखाए गए आभूषणों में भी वे केवल नूपुर पहचान पाए थे।
लक्ष्मण ने बताया कि जब श्रीराम और माता सीता कुटिया में विश्राम करते थे, तब वे पूरी रात धनुष-बाण के साथ पहरा देते थे। निद्रा ने जब उन्हें घेरने का प्रयास किया, तो उन्होंने उसे अपने बाणों से पराजित कर दिया। निद्रा ने वचन दिया कि वह 14 वर्षों तक लक्ष्मण को स्पर्श नहीं करेगी, केवल अयोध्या में राज्याभिषेक के समय ही उन्हें घेरेगी—जिसका प्रमाण छत्र गिरने की घटना बनी।
लक्ष्मण ने बताया कि वे बिना श्रीराम की आज्ञा के भोजन नहीं करते थे। जो फल वे लाते, उन्हें संभालकर रख देते थे। प्रभु के आदेश पर चित्रकूट की कुटिया से फल लाए गए, जिनकी गिनती में केवल सात दिनों के फल कम पाए गए।
इन सात दिनों में—
इन परिस्थितियों में भोजन की सुध ही नहीं रही।
लक्ष्मण ने बताया कि उन्होंने विश्वामित्र मुनि से बिना आहार जीवित रहने की विद्या प्राप्त की थी, जिससे वे वर्षों तक अपनी भूख पर नियंत्रण रख सके।
भाई लक्ष्मण की तपस्या, संयम और त्याग की यह कथा सुनकर भगवान श्रीराम भावविभोर हो गए और उन्होंने लक्ष्मण को हृदय से लगा लिया।
यह कथा न केवल लक्ष्मण के पराक्रम को उजागर करती है, बल्कि यह भी सिखाती है कि निःस्वार्थ सेवा, अनुशासन और तपस्या ही सच्चे बल का स्रोत होते हैं।