इस संसार में प्रतिदिन नई-नई घटनाएँ घटती रहती हैं। कभी सम्मान मिलता है, तो कभी अपमान; कभी सुख आता है, तो कभी दुख; कभी लाभ, तो कभी हानि। यही जीवन का स्वभाव है। हम सभी इस अनिश्चित दुनिया का हिस्सा हैं, इसलिए ऐसे अनुभवों से कोई भी अछूता नहीं रह सकता।
जब सम्मान मिलता है, तो मन प्रसन्न हो जाता है। लेकिन जब अपमान होता है, दुख पहुँचता है या कोई हमारे साथ अन्याय करता है—तब मन दुखी, अशांत और क्रोधित हो उठता है। यह स्वाभाविक है, परंतु यह अवस्था मन की शांति छीन लेती है।
अगर संसार को बदलना कठिन है, तो हमें अपने भीतर परिवर्तन लाना होगा। जैसा बुद्धिमानों ने कहा है—दुनिया बदलना संभव न हो, तो अपने मन को मजबूत बनाना आवश्यक है।
जैसे सड़क पर कंकड़ हों…
मान लीजिए आपको 5 किलोमीटर कंकड़-पत्थर वाली सड़क पर पैदल चलना है। कोई आपके लिए रास्ते पर कालीन नहीं बिछाएगा। समाधान सिर्फ एक है—मजबूत तले का जूता पहन लेना।
इसी प्रकार जीवन में भी लोग अपनी मूर्खता, स्वार्थ और अज्ञानता में कभी न कभी हमारे साथ गलत व्यवहार करेंगे। हम उन्हें बदल नहीं सकते, लेकिन अपने मन को बचा सकते हैं।
मन को शांत रखने के दो सरल वाक्य
विद्वानों ने ऐसी स्थिति में मन को तुरंत शांत करने के लिए दो अत्यंत सरल वाक्य बताए हैं—
1. “कोई बात नहीं”
यह कहने से छोटी-छोटी बातों का दुख तुरंत कम हो जाता है।
2. “ईश्वर न्याय करेंगे”
और जब अन्याय इतना बड़ा हो कि हम रोक न सकें, और संसार भी हमें न्याय न दे पाए—तब यही वाक्य मन में शांति लाता है।
इन शब्दों को मन में दोहराने से मन का बोझ हल्का हो जाता है। विश्वास जागता है कि अंतिम न्याय करने वाला कोई है—जो सब देख रहा है।
किन तीन वाक्यों से बचना चाहिए?
यदि आप बार-बार मन में ये सोचें—
- “ऐसा क्यों हुआ?”
- “ऐसा क्यों किया?”
- “ऐसा क्यों बोला?”
तो क्रोध, घृणा और दुःख कई गुना बढ़ जाते हैं। इसलिए इन शब्दों का उपयोग कभी न करें।
निष्कर्ष
संसार जैसा है, वैसा ही रहेगा।
परंतु आपका मन कैसा रहेगा, यह आपके हाथ में है।
इसलिए:
“कोई बात नहीं।”
“ईश्वर न्याय करेंगे।”
इन दो वाक्यों को अपनाएँ, अपने कार्य में लगे रहें, मस्त रहें और सदैव प्रसन्न रहें।

