मित्रता अपने आप में एक गहन भाव व्यवहार लिए है जो आपको भाव और व्यवहार से प्रभावित करती है। मित्रता आज के समय की एक ऐसी परिभाषा बन चुकी है जिसे लोग अपने अपने तौर तरीके से इस्तेमाल कर जाते हैं उनमें से कुछ स्वार्थ के स्तंभ पर बैठ कर अपने जीवन नौका विहार करते रहते हैं तो कुछ ऐसे लोग भी पाए जाते हैं जो आजीवन अपने लिए नहीं वरन दूसरों को निः स्वार्थ मित्र बनाकर उनको सुख पहुंचाने के लिए अपना खून पसीना एक कर देते हैं ।
तन मन सब कुछ दांव पर लगा देते हैं। ऐसी मित्रता के आधार भूत मनुष्य आज के समय तनिक ही शेष हैं । जो गणना में नहीं आते जिन्हें लोग नहीं जानते जो जानने में आते हैं वे किसी न किसी बहाने भुला दिए जाते हैं। मित्रता एक ऐसा संबंध है जिसे निभाना बहुत ही कठिन काम है। महाभारत काल से मित्रता के विषय में अनेक उपाख्यान पड़ते हैं। मित्रता के शीर्ष आधार महान योद्धा कुंती पुत्र कर्ण । राजाधिराज योगीराज भगवान श्री कृष्ण जो गांडीव धारी अर्जुन के परम् सखा । बचपन में शिक्षा काल में जा भगवान श्री कृष्ण और दाऊ जी गुरुकुल में अध्ययन करते थे तब उनके बाल सखा सुदामा जी ।
भगवान श्री कृष्ण ने अपने बाल काल में बाल सखा श्रीदामा आदि के साथ अपनी मित्रता को अनोखे अनोखे निभाया । कभी वे अपने बाल सखाओं के लिए माखन चोरी करते , कभी उनके लिए पेड़ पर चढ़ कर गोपीकाओं से भी लड़ जाते और मां यशोदा से डांट खाते , एक बार अपने मित्रों के , और सारे बृजवासियों के लिए यमुना में कूद गए । अपने मित्रों की रक्षा के तो न जाने कितने राक्षस को मार डाला था । हमारे भगवान श्री कृष्ण हर कला के पारखी कहे जाते हैं, हर गुण उनका उत्तम है, लीला उनकी आत्मा को सुख देने वाली है। जैसा मैंने ऊपर बताया कि आज के समय की मित्रता के उपादान पूरी तरह परिवर्तित हो गए हैं। हर तरफ स्वार्थ की मार मची है। सबके दिल में अहंकार,ईर्ष्या की तपन है जो सबको जला रही है।
वास्तव मे मित्रता एक गहन संवाद जैसा ही है। बिना सोचे समझे किसी को मित्र बना लेना कभी न कभी खतरे को निमंत्रण दे जाता है। आचार्य चाणक्य ने कहा है कि मित्रता सदैव समानता में ही निहित है, समान बल व बुद्धि, पद प्रतिष्ठा से युक्त लोगों को आपस में मैत्री बनानी चाहिए। एक गरीब और एक अमीर में मित्रता सदैव संभव नहीं होती है दुर्भाग्य से उसका मन परिवर्तित हो सकता है।
मित्रता सदैव ही अपने समान गुणवान , कुलवान विचारवानों के साथ ही करनी चाहिए। अब मित्र की पहचान कब होती है..? सच्चे मित्र के क्या लक्षण होते हैं..? इन सभी बातों का पता हमें अपने विवेक से करना चाहिए। रहीम दास जी का एक प्रसिद्ध दोहा है _ मथत मथत माखन रहे , दही महि बिलगाय ।रहिमन सोई मीत है,जो भीर पड़े ठहराई।। रहीम दास जी कहते हैं कि एक अच्छे और सच्चे मित्र की पहचान तब होती है जब आप किसी विपत्ति में हों , कष्ट में हों सुख में कभी आप अपनों को परायों की पहचान नहीं कर सकते सुख में तो गैर भी अपने बन ने के लिए आ जाते हैं। इसीलिए रहीम कहते हैं जिस प्रकार दही को बिलोते बिलौते दही और छाछ तो अलग हो जाते हैं लेकिन मक्खन अपने स्थान पर स्थिर रहता है। यही है सच्चे मित्र की पहचान।उसी प्रकार हमें मित्र चयन में अपना समय व्यतीत नहीं करना चाहिए। आज के आधुनिक समय की व्यस्तता और स्वार्थ परक दृष्टि हम सब को एक भिन्न स्तर ले जा रही है। जिससे कोई भी फलीभूत नहीं होगा । लेखक :अभिलाषा ✍️
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